भारत का पहला Silicon Wafer किसने बनाया?
आज जब भारत सेमीकंडक्टर निर्माण (Semiconductor Manufacturing) में तेजी से आगे
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| IISc बेंगलुरु के Prof. A. R. Vasudeva Murthy और Prof. G. Suryan द्वारा विकसित भारत के शुरुआती Silicon Ingot और Silicon Wafer अनुसंधान की कहानी। |
बढ़ रहा है, तब बहुत कम लोगों को पता है कि भारत ने सिलिकॉन वेफर बनाने की दिशा में कदम आज नहीं, बल्कि लगभग छह दशक पहले ही उठा लिया था।
इस उपलब्धि के पीछे थे Indian Institute of Science (IISc), Bengaluru के दो महान वैज्ञानिक—Prof. A. R. Vasudeva Murthy और Prof. G. Suryan। इन दोनों ने भारत में उच्च शुद्धता वाले सिलिकॉन (High Purity Silicon), Silicon Ingot और Silicon Wafer बनाने की तकनीक विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
Silicon Ingot और Silicon Wafer क्या होते हैं?
Silicon Ingot अत्यधिक शुद्ध सिलिकॉन का एक बेलनाकार ठोस ब्लॉक होता है। इसी Ingot को बेहद पतली परतों में काटकर Silicon Wafer बनाया जाता है।
यही Silicon Wafer आगे चलकर माइक्रोप्रोसेसर, मेमोरी चिप, मोबाइल फोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर पैनल और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की आधारशिला बनता है।
सरल शब्दों में कहें तो हर आधुनिक चिप की शुरुआत Silicon Wafer से होती है।
भारत में Silicon Wafer तकनीक की शुरुआत कैसे हुई?
1960 के दशक में भारत सरकार ने देश में सेमीकंडक्टर तकनीक विकसित करने के उद्देश्य से IISc Bengaluru में अनुसंधान को बढ़ावा दिया।
इसी दौरान Prof. A. R. Vasudeva Murthy और Prof. G. Suryan ने उच्च गुणवत्ता वाले सिलिकॉन तैयार करने तथा Silicon Ingot और Wafer निर्माण की तकनीक विकसित करने पर कार्य किया।
उस समय यह उपलब्धि अत्यंत महत्वपूर्ण थी क्योंकि विश्व में केवल कुछ ही देशों के पास यह तकनीक उपलब्ध थी।
इसके बाद क्या हुआ?
IISc में विकसित तकनीक के आधार पर तमिलनाडु के Mettur Chemicals में सिलिकॉन वेफर उत्पादन की दिशा में औद्योगिक प्रयास किए गए।
कुछ समय तक भारत में बने Silicon Wafers का उपयोग भी हुआ, लेकिन बड़े पैमाने पर निवेश, आधुनिक उपकरणों और निरंतर तकनीकी उन्नयन की कमी के कारण यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।
उसी दौरान जापान, अमेरिका, दक्षिण कोरिया और बाद में ताइवान ने सेमीकंडक्टर उद्योग में भारी निवेश किया और आज वे इस क्षेत्र में विश्व के अग्रणी देश बन चुके हैं।
क्या भारत उस समय दुनिया का बड़ा Semiconductor Hub बन सकता था?
इस प्रश्न का निश्चित उत्तर देना संभव नहीं है, लेकिन कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि उस समय लगातार सरकारी समर्थन, निजी निवेश और आधुनिक उत्पादन सुविधाएँ मिलतीं, तो भारत सेमीकंडक्टर उद्योग में कहीं अधिक मजबूत स्थिति हासिल कर सकता था।
हालाँकि वैश्विक प्रतिस्पर्धा, पूंजी निवेश, तकनीकी विकास और अंतरराष्ट्रीय बाजार जैसे कई अन्य कारकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती।
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| IISc बेंगलुरु के Prof. A. R. Vasudeva Murthy और Prof. G. Suryan द्वारा विकसित भारत के शुरुआती Silicon Ingot और Silicon Wafer अनुसंधान की कहानी। |
आज भारत फिर से क्यों चर्चा में है?
आज भारत India Semiconductor Mission (ISM) के तहत सेमीकंडक्टर उद्योग में बड़े स्तर पर निवेश कर रहा है।
देश में कई नई Semiconductor, ATMP और OSAT परियोजनाएँ शुरू हो चुकी हैं। सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक चिप सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा बने।
यदि यह मिशन सफल होता है, तो भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, रक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ी छलांग लगा सकता है।
भूले-बिसरे वैज्ञानिक, जिनका योगदान याद रखा जाना चाहिए
Prof. A. R. Vasudeva Murthy और Prof. G. Suryan का योगदान भारतीय विज्ञान के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।
उन्होंने उस दौर में सेमीकंडक्टर तकनीक की नींव रखी, जब भारत के पास सीमित संसाधन और तकनीकी सुविधाएँ थीं। आज जब भारत फिर से चिप निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब उनके कार्य को याद करना और नई पीढ़ी तक पहुँचाना आवश्यक है।
निष्कर्ष
भारत की सेमीकंडक्टर यात्रा नई नहीं है। इसकी शुरुआत दशकों पहले हो चुकी थी। आज भारत उसी सपने को नई तकनीक, बड़े निवेश और वैश्विक साझेदारियों के साथ आगे बढ़ा रहा है।
यदि आने वाले वर्षों में भारत सफलतापूर्वक Semiconductor Manufacturing Ecosystem विकसित कर लेता है, तो यह उन वैज्ञानिकों के सपने को आगे बढ़ाने जैसा होगा जिन्होंने इसकी नींव रखी थी।
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